ललित मोहिनी कुंज में राजत अद्भुत रूप
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Verse 14 of 23
अब कोउ कहो कूर कुटिल यह, कामी कृपन कहो कोउ मौंनी।
यौं कौतिक कृपा निरखै नित्य, श्रीनागरीदासि लियैं रस थौंनी॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (16)
अब कौन मुझे बुरा कहेगा, कुटिल याह, कौन मुझे हवसी इनायत कहेगा, कौन मुझे चुप कहेगा। यह दिव्य कृपा सदैव बनी रहती है, श्री नागरीदासी लियाइन रस थौनी.. - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (16)