ललित मोहिनी कुंज में राजत अद्भुत रूप

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Verse 15 of 23

बिपुल बिहारिनिदासि तैं, अब छिन छिन मन आनंद। यौं निरखत नागरीदास नित, दूलहु दुलहिनि मकरन्द॥ - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (19) बिपुल बिहारिनीदासी ताई, अब मन का आनंद लो। यौं निरखत नागरीदास नित, दुलहु दुलहिनी मकरंद।।- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (19)
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