ललित मोहिनी कुंज में राजत अद्भुत रूप

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Verse 17 of 23

कै खानों कै सोवनौं, कै नित्य उठि करत बिगार। श्रीनागरीदासि अनन्य प्रभु, भजि तजि मन जंजार॥ - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (12) कौन खाता है और कौन सोता है, कौन बिना कुछ किए हर दिन उठता है। श्रीनगरीदासी अन्य भगवान, भजि तजि मन जंजार.. - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, सखी (12)
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