यह वृन्दावन यह समैं

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Verse 5 of 23

गौर श्याम नित एक रस, नौतन नेह अछेह। एक वय क्रम एक मन, एक प्रान द्वै देह॥ - श्री नागरी दास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, निकुंज विलास (3) गौर श्याम नित एक रस, नौतन नेह अच्छे। एक आज्ञा, एक मन, एक प्राण, दो शरीर.. - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी के वचन, निकुंज विलास (3)
जो मन अरुझ्यो रूप हैं क्यों हू कहत बनैं नयह वृन्दावन यह समैं