हीरा कौं ललिचात लिवासी
Nagaridev Vani — श्री नागरीदेव
Verse 2 of 15
अति निरपेक्ष संग संग्रह, अनन्य आँन गति नाँहिं।
श्रीबिहारिनीदासि उपासि सुख, संग पैठि महल मन माँहि॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, साखी (3)
बहुत संपूर्ण संग्रह, किसी अन्य खाद्य आंदोलन की तरह नहीं। श्री बिहार निदासी उपासी सुख, संग पथि महल मन मनहि.. - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जू की वाणी, साखी (3)