हीरा कौं ललिचात लिवासी

Nagaridev Vani — श्री नागरीदेव

Verse 4 of 15

हीरा कौं ललिचात लिवासी, परचौ पूँजी न मर्मी। श्रीनागरीदासी विहारै चाहत, बिना अनन्य धन धर्मी॥ - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, साखी (7) हीरा कौन लालिचत लिवासी, परचौ पुंजी एन मरमी। श्री नागरीदासी विहारै चाहत, अनन्य धन रहित, धर्मात्मा। - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जू की वाणी सखा (7)
चरनकमल रज सेइहौं, मन-बच-क्रम यह आस। हीरा कौं ललिचात लिवासी