मुसिक्यात जात सखी कहत बात
Nagaridev Vani — श्री नागरीदेव
Verse 7 of 15
(राग श्याम कली)
मुसिक्यात जात सखी कहत बात।
प्रेम मुदित ह्वै उदित प्रियाप्रिय पुलकि पुलकि लपटात गात॥ [1]
अनंग रंग रस रूप अनुपम फूले अंग अंग न समात।
नागरिदासि दंपति दुलरावति निरखि निरखि नैन न अघात॥ [2]
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, शृंगार रस के पद (7)
(राग श्याम काली) मुसिक्यत जात सखी कहत बात। प्रेम मुदित ह्वै उदित प्रियप्रिया पुलकि पुलकि लपटत गत.. [1] अंग रंग रस रूप अनुपम फुले अंग अंग समात। नागरीदासी युगल दुलरावती निरखि निरखि नैन न अघट।।[2] - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जू की वाणी, शृंगार रस के छंद (7)