रे मन श्रीवृन्दावन चल
Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास
Verse 27 of 108
(राग तिलंग त्रिताल)
रे मन श्रीवृन्दावन चल।
यमुना सरस सुखद अति सोहे, नीर बहै कल-कल॥ [1]
जहाँ विराजत राधारानी, लिये सहचरी दल।
हितगोपाल को प्राण-प्रिया के, चरण कमल को बल॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (52)
(राग तिलंग त्रिताल) हे मन, चलो श्री वृन्दावन चलें। यमुना अति मधुर और अति मनभावन है, बहते जल के समान बहती है.. [1] राधारानी जहां भी निवास करती हैं, वहां उनकी सखियों की टोली होती है। हित गोपाल को अपना जीवन प्यारा है, उनके चरण कमलों में शक्ति है.. [2] - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुंजी धारक], निकुंज रस वल्लारी (52)