रसमय धाम सृष्टि

Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास

Verse 31 of 108

अचरज धाम नाम वृन्दावन, रसमय सृष्टि जहाँ है। [1] अचरज गौर श्याम रस भोगी, सन्तत सदा तहाँ है॥ [2] अचरज रूप सहेली जे, दम्पति सेवा सुख चाहैं। [3] वृन्दावन हित रूप अलौकिक, यह सुख अनत कहाँ है॥ [4] - चाचा श्री हित वृंदावन दास, श्रीयुगल सनेह पत्रिका (60) अचरज धाम का नाम वृन्दावन है, जहाँ सुन्दर सृष्टि है। [1] अचरज गौर श्याम रस भोगी, संतत सदा तहां। [2] मित्रों का विचित्र रूप, युगल, सेवा सुख चाहते हैं। [3] वृन्दावन हित अलौकिक है, यह सुख कहाँ अनन्त है.. [4] - चाचा श्री हित वृन्दावन दास, श्रीयुगल सनेह पत्रिका (60)
श्यामा चरण कमल की आसवृन्दावन छाँड़ि कहूँ सुख नाहीं