वृन्दावन छाँड़ि कहूँ सुख नाहीं
Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास
Verse 32 of 108
(राग हमीर त्रिताल)
वृन्दावन छाँड़ि कहूँ सुख नाहीं।
सुन्दर यमुना प्रीतम प्यारी, प्यारी कदमन छाँहीं॥ [1]
वंशीवट सेबाकुञ्ज प्यारो, प्यारी चरण दवाँहीं।
चाल गयन्दिनि कुञ्जन विचरें, दिये युगल गलबाँहीं॥ [2]
वेणी गूँथे प्रीतम प्यारी, तन की सुध-बुध नाहीं।
निशिदिन अबतो श्रीगोपालहित, प्यारी के गुण गाईं॥ [3]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (67)
(राग हमीर त्रिताल) वृन्दावन छन्दै, सुख के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। सुन्दर यमुना प्रेतम, सुन्दर कदमन चाहना। आओ गयंदिनी कुंजन ने सोचा, दंपत्ति को कालर दिया... [2] वीणि गुंठे प्रिय प्रियतम, तन की ज्योति नहीं। निशिदिन अबतो श्री गोपालहित, प्यारी के गुण लाभ.. [3] - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुंज वेले], निकुंज रस वल्लरी (67)