मन श्री राधा-राधा कहि रे
Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास
Verse 35 of 108
(राग आसावरी त्रिताल)
मन श्री राधा-राधा कहि रे।
नाम निरन्तर रसना पीवे, दृढ़कर याको गहि रे॥ [1]
यह जग सपनो अपनो नाही, नाम सुधा-रस बहि रे।
श्रीगोपालहित हरी स्वामिनि, जैसे राखे रहि रे॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (76)
(राग आसावरी त्रिताल) मन में श्री राधा-राधा कहें। निरंतर नाम का रस पिओ, गहराई से देखो.. [1] इस जगत में स्वप्न तुम्हारे नहीं, सुधा-रस नाम का झरना बह रहा है। श्री गोपालहित हरि स्वामिनी, जैसे राखे रहि रे.. [2] - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुंज वाले], निकुंज रस वल्लरी (76)