मन श्री राधा-राधा कहि रे
Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास
Verse 39 of 108
(राग आसावरी, त्रिताल)
मन तू राधा-राधा भज ले।
याहि रटत निरन्तर शुक मुनि,
शिव नारद सनकादिक अज ले॥ [1]
औसर जात बार नहि लागे,
काल रह्यो सिर गज ले।
नव-नागर गोपाल प्रिया के,
चरण चिह्न की रज ले॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (83)
(राग आसावरी, त्रिताल) मन में राधा-राधा की आराधना करनी चाहिए। यह गीत निरंतर चलता रहता है, शुक मुनि, शिव नारद सनकादिक आज ले.. [1] औसर जात बर नहीं लागे, कल रहो सिर गाजा ले। नवा-नगर गोपाल प्रिया के, चरण चिन्हों का रहस्य ले लो.. [2] - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुंज वेले], निकुंज रस वल्लरी (83)