वृन्दावन छाँड़ि कहूँ सुख नाहीं
Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास
Verse 48 of 108
(राग हमीर, त्रिताल)
अब हम प्रिया कृपा धन पायो।
श्रीवृन्दावन घूमंत डोलूँ, कहौ काह नहीं पायो॥ [1]
दासी निज महलन की कीनी, हरषि-हरष जस गायो।
ललित हरी गोपाल प्रिया सों, अब तो नेह लगायो॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (116)
(राग हमीर, त्रिताल) अब प्रिया, तुम्हारी कृपा से हमें धन प्राप्त हो। श्री वृन्दावन की पथिक, मैं क्या कहूँ, मैं कुछ भी कहने में समर्थ नहीं हूँ.. [1] मेरे महल की दासी, मैं जैसी भी हूँ सुखी हूँ। ललित हरि गोपाल प्रिय पुत्र, अब अपना प्रेम लगाओ.. [2] - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुंज वेले], निकुंज रस वल्लरी (116)