सखी हों राधा चरण उपासी
Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास
Verse 49 of 108
(राग त्रिलंग, त्रिताल)
सखी हों राधा चरण उपासी।
नित रहूँ गरवीली मन में, करती नित्त खवासी॥ [1]
सेवाकुञ्ज की सघन लता में, सदा बनी सुखरासी।
सर्वस 'श्रीगोपाल' प्रिया की, बनी रहूँ निज दासी॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (117)
(राग त्रिलंग, त्रिताल) राधाचरण के उपासक को अपना मित्र बनाओ। मेरे मन में सदैव अभिमान रहता है, मैं स्वयं को सदैव प्रसन्न रखता हूँ। [1] सेवा कुंज की घनी लता में, मैं सदा सुखी नारी बनी रहती हूँ। प्रिया के सब 'श्री गोपाल', मैं दासी ही रहूँ.. [2] - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुंज वेले], निकुंज रस वल्लरी (117)