बिहारी जू है तुम लौ मेरी दौर

Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास

Verse 64 of 108

(राग सोरठ व विहाग) धर मन राधिका पद ध्यान। जिन्हें सेवत कुंज में नित, रसिक श्याम सुजान॥ [1] सतत चिंतत शंभु अज जिहि, सकल सुख की ख़ान। भनत महिमा अमित जिनकी, शास्त्र वेद पुराण॥ [2] अष्ट द्वै अंगुष्ठ अँगुरी, गनित दस अनुमान। देत दसधा भक्ति जो नित, करहि अनुसंधान॥ [3] चन्द्र नख की चन्द्रिका सों, हरत हिय तम जान। कंज ते कोमल कलित जो, 'सरस' जीवन प्रान॥ [4] - श्री सरस माधुरी (राग सोरठ वि विहागा) धर मन राधिका पद ध्यान। सेवा कुंज में सदा रसिक श्याम सुजान..[1] सतत चिन्ता शम्भू उपस्थित आज, सकल सुख की खान। अमित, जिसकी महिमा शास्त्रों, वेदों और पुराणों से भी अधिक है। [2] अष्ट द्वै अंगुष्ठ अंगुरि, गणित दास अनुमान। जो प्रतिदिन दसगुणी भक्ति देता है और अनुसंधान करता है। [3] चन्द्रमा के नाखून के पुत्र चन्द्रिका तुम्हारे स्वामी हैं। 'परम कोमल', 'सरस' है जीवन का प्राण.. [4] - श्री सरस माधुरी
मन श्री राधा-राधा कहि रेकीवे कहा पढ़वे को कहा फल