कीवे कहा पढ़वे को कहा फल

Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास

Verse 76 of 108

कदम कुंज ह्वै हों कबै, श्रीवृंदावन मॉंह । ललित किशोरीलाड़िले, बिहरैंगे तिहि छॉंह ॥ कब हौं सेवा कुंज में ह्वैं हों श्याम तमाल । लतिका कर गहि विरमि है, ललित लडैतीलाल ॥ सुमन वाटिका विपिनमें, ह्वै हों कब हौं फूल । कोमल कर दोउ भावते, धर हैं बीन दुकूल ॥ कालीदह कब कूल की, ह्वैहौं त्रिविध समीर । युगुल अंग अँग लागि हौं, उडि हैं नूतन चीर ॥ मिलि है कब अंग छार ह्वै, श्रीवन बीथिन धूर। परि है पद पंकज युगुल, मेरी जीवन मूर ॥ कब गहबर की गलिन में, फिर हौं होय चकोर । युगुल चन्द मुख निरखि हों,नागरि नवलकिशोर ॥ कब कालिन्दी कूल की, ह्वै हौं तरुवर डार । ललित किशोरी लाडिले झूलें झूला डार ॥ श्यामा पद दृढ गहि सखी,मिलिहैं निश्चय श्याम । ना माने दृग देखले, श्यामा पद बिच श्याम ॥ - अज्ञात
नेक आगे आ श्याम तोपे रंग डारौंकमल से कोमल ओ चीकने जू माखन ते,