कमल से कोमल ओ चीकने जू माखन ते,

Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास

Verse 77 of 108

कमल से कोमल ओ चीकने जू माखन ते, परे दृष्टि कृपामयी होत प्रेम वृष्टि है। [1] तिहारे चरण अरविन्द जू निहारे राधे, विमल अनूप लखी रसमयी सृष्टि है॥ [2] मोहन मन मोहिवे की गति हूँ भूल जात, ऐसो प्रभाव लखि वारो रति कोटि है। [3] सेवत चरन सेवा कुञ्ज में अनोखी भाँति, 'प्रियादासी' निरखत लतान द्रुम ओट है॥ [4] - श्री प्रियादासी जी कमल से भी अधिक कोमल या मक्खन से भी अधिक चिकनी, दृष्टि से परे एक प्रेमपूर्ण वर्षा होती है। [1] अरविन्द जू चरण देखिये, विमल अनूप लखि लखि रसमयी सृष्टि। [2] मोहन मोहिवे की गति भूलो मोहन, लखि वारो रति का ऐसा प्रभाव अपार। [3] सेवा चरण सेवा कुंज में 'प्रियदासी' अनोखे ढंग से लिखी गई है.. [4] - श्री प्रियादासी जी
कीवे कहा पढ़वे को कहा फलदेहु निकुंज निवास स्वामिनी