मोहि वास सदा वृन्दावन कौं, नित उठ यमुना पुलिन नहाऊँ। [1]
Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास
Verse 85 of 108
मोहि वास सदा वृन्दावन कौं, नित उठ यमुना पुलिन नहाऊँ। [1]
गिरि गोवर्द्धन की दे परिक्रमा, दर्शन कर जीवन सफल बनाऊँ॥ [2]
सेवाकुञ्ज की करुँ आरती, व्रज की रज में ही मिल जाऊँ। [3]
ऐसी कृपा करौ श्रीराधे, वृन्दावन छोड़ बाहर न जाऊँ॥ [4]
- ब्रज के सवैया
जो सदैव वृन्दावन में निवास करती है, जो प्रतिदिन जागकर यमुना नहीं खींचती। [1] गिरि गोवर्धन की परिक्रमा करूँ और दर्शन कर अपना जीवन सफल करूँ.. [2] सेवा कुंज की आरती करूँ और व्रज के आनंद में डूब जाऊँ। [3] कृपा करो श्री राधे, मैं वृन्दावन से बाहर नहीं जाता.. [4] -ब्रज की सविया।