ब्रज में होत कुलाहल भारी

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 11 of 33

(राग मारू) ब्रज में होत कुलाहल भारी। आनन्द मगन ग्वाल सब नाचत, देत परस्पर तारी॥ [1] नन्दराय के भवन में आवत, आनंदित ब्रजनारी। पुत्र जनम सुनि हर्ष भयौ है, 'परमानन्द' बलिहारी॥ [2] - श्री परमानन्द दास जी (राग मारू) ब्रज पुरुष होत कुलाहल भारी। हर्षित ग्वाल-बाल सभी नृत्य करते हैं, एक-दूसरे को तार देते हैं.. [1] हर्षित ब्रजनारी नंदराय के घर आती हैं। पुत्र 'परमानन्द' बलिहारी के जन्म के बाद बड़ा भय होता है.. [2] - श्री परमानन्द दास जी
बाँह डुलावति आवति राधाचलि राधा! तोकौं स्याम बुलावै