मेरौ मन बाबरौ भयौ

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 14 of 33

(राग धनाश्री व सारंग) धनि धनि बृंदावन के वासी। नित प्रति चरन कमल अनुरागी, स्यामा स्याम उपासी॥ [1] या रस को जो मरम न जानै जाय बसौ सो कासी। भसम लगाय गरैं लिंग बाँधौ सदाइ रहौ उदासी॥ [2] अष्ट महासिद्धि द्वारें ठाढ़ी मुकुति चरन की दासी। 'परमानंद' चरन कमल भजि सुंदर घोष निवासी॥ [3] - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1372) (राग धनश्री वे सारंगा) धानी धानी, बृंदावन निवासी। मैं प्रत्येक दिन के चरण कमलों का प्रेमी हूं, मैं प्रत्येक दिन का पुजारी हूं। भसम लगय गरइ लिंग बंधौ, सदाइ रहु सदायु..[2] आठ महासिद्धियों के दौरान मैं मुकुटधारी चरणों का दास बन गया। 'परमानन्द' चरण कमल भाजी सुन्दर घोष निवासी.. [3] - श्री परमानन्द दास, परमानन्द सागर (1372)
धन धन राधिका के चरनबाँह डुलावति आवति राधा