बाँह डुलावति आवति राधा

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 15 of 33

(राग सारंग) जबते प्रीति श्याम सों कीनी। तादिन ते मेरे इन नैंननि ने नेकहु नींद न लीनी॥ [1] सदा रहत चित चाक चढ्यो सो और कछु न सुहाय। मन में रहे उपाय मिलन को इहै विचारत जाय॥ [2] परमानंद पीर प्रेम की काहु सों नहीं कहिये। जैसे बिथा मूक बालक की अपने तन मन सहिये॥ [3] - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (417) (राग सारंगा) जाबते प्रीति श्याम पुत्र किनी। उस दिन के बाद से मेरे दादा-दादी न तो बोलते थे और न ही सोते थे… [1] हमेशा खुश रहो और कुछ भी अच्छा नहीं लगता। जो भी उपाय मन में हो, मिलने का उपाय सोचो.. [2] उसे आनंद-प्रेम का पुत्र क्यों न कहा जाए? अपने शरीर और मन को व्यवस्थित करते हुए एक मूक बच्चे की तरह बैठे रहें.. [3] - श्री परमानंद दास, परमानंद सागर (417)
मेरौ मन बाबरौ भयौमेरौ मन बाबरौ भयौ