मेरौ मन बाबरौ भयौ

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 16 of 33

(राग धनाश्री व सारंग) जो जन हिरदै नाम धरै। अष्ट सिद्धि नव निधि को बपुरी लटकत लारि फिरै॥ [1] ब्रह्मलोक इंद्र लोक सिवलोक सबहू तै ऊपरै। जो न पत्याऊं तौ चितवौ ध्रुव तन टारयौ हू न टरै॥ [2] सुंदर स्याम कमल दल लोचन सब दुख दूरि करै। 'परमानंददास' कौ ठाकुर वाचा ते न टरै॥ [3] - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1359) (राग धनाश्री वे सारंगा) जो जान हृदय नाम धरै। अष्ट सिद्धि नव निधि लटकती हुई लार से भरी हुई है। [1] ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक, शिवलोक, सब ऊपर हैं। यदि न पत्तियाँ हैं, न डंडियाँ हैं, तो शरीर समुद्र में है, न ही कोई घाटी है। [2] सुन्दर समुद्र, कमल के फूल, सरोवर समस्त दुःखों को दूर करने वाले हैं। ठाकुर वाचा ते न तराई तो 'परमानंद दास'.. [3] - श्री परमानंद दास, परमानंद सागर (1359)
बाँह डुलावति आवति राधाकौन रसिक है इन बातनि कौ