चलि राधा! तोकौं स्याम बुलावै
Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास
Verse 18 of 33
(राग बसंत)
खेलत मदन गोपाल बंसत।
नागरि नवल रसिक-चूडामनि, सब बिधि रसिक राधिका कंत॥ [1]
नैन-नैन-प्रति चारु बिलोकनि, बदन-बदन-प्रति सुंदर हास।
अंग-अंग प्रति प्रीति निरंतर, रितु आगम निसि करहिं विलास॥ [2]
बाजत ताल मृदंग अधौटी, डफ बाँसुरी कोलाहल केलि।
'परमानंद' स्वामी के संगम, मिलि नाचत-गावत रँग-केलि॥ [3]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1165)
(राग बसंत) मदन गोपाल बसंत बजाते हैं। नागरी नवल रसिका-चूड़ामणि, सब बिधि रसिक राधिका कंत।।[1] नैना-नैना-प्रति चारु बिलोकनि, बदन-बदन-प्रति सुंदर है। अंग-अंग से प्रेम निरंतर, ऋतु अगम निसि करहिं विलास।।[2] बाजत ताल मृदंग अधौति, दफ बांसुरी शोर केली। 'परमानंद' स्वामी का संगम, मिल्ली नाचता-गावत रंगा-केलि.. [3] - श्री परमानंद दास जी, परमानंद सागर (1165)