प्रीति तौ एकहिं ठौर भली

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 23 of 33

(राग कल्याण व गौरी) प्रीति तौ एकहिं ठौर भली। यह जु कहा मति चरन कमल तजि फिरे जु चली चली॥[1] ते जानै जे सब विधि नागर सार सार गहि लोग। पायौ स्वाद मधुप रस लोभी स्याम धाम संयोग॥ [2] ‘परमानंददास' गुन सुंदर नारदादि मुनि ग्यानी। सदा विचार विषय रस त्यागी जसु गावत मधु बानी॥ [3] - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (455) (राग कल्याण बनाम गौरी) प्रीति तौ एकहिं ठोर भली। कहाँ हैं मेरे चरण कमल और कहाँ है अग्नि? [1] तुम नगर के और भीतर के लोगों के सब नियम-कायदे जानते हो। मधु लोभ लोभ स्याम धाम त्याग का स्वाद पीयो। [2] 'परमन्नदादास' के गुण सुन्दर एवं ज्ञानवर्धक हैं। रस त्यागी जसु गावत मधु बानी विषय का सदैव चिंतन करो.. [3] - श्री परमानंद दास जी, परमानंद सागर (455)
बाँह डुलावति आवति राधाप्रीति तो नंदनंदन सों कीजै