प्रीति तो नंदनंदन सों कीजै

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 24 of 33

(राग आसावरी) प्रीति तो नंदनंदन सों कीजै। संपति विपति परे प्रतिपाले, कृपा करें तो जीजे॥ [1] परम उदार चतुर चिंतामणि, सेवा सुमिरन मानें। हस्त कमल की छाया राखत, अंतरगति की जानें॥ [2] वेद पुरान श्री भागवत भाखे, कियो भक्तन मन भायो। परमानन्द! इंद्र सो वैभव, विप्र सुदामा पायो॥ [3] - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1302) (राग आसावरी) प्रीति ते नन्दनन्दन पुत्र किजै। सनापति का पति को उत्तर, आप कृपा करें तो जीजाजी को प्रसन्न करें.. [1] परम उदार चतुर चिंतामणि, विचार सेवा सुमिरन। कमल हस्त की छाया बनी रहती है, आंतरिक हलचल पैदा होती है। [2] वेद पुराण श्री भागवत भाके, कियो भक्तन मन भयो। परम आनंद! इन्द्र सो वैभव, विप्र सुदामा पायो.. [3] - श्री परमानन्द दास जी, परमानन्द सागर (1302)
प्रीति तौ एकहिं ठौर भलीबाँह डुलावति आवति राधा