बाँह डुलावति आवति राधा
Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास
Verse 25 of 33
(राग सारंग)
साँची प्रीति भई इक ठौर।
मृगनयनी कमल दल लोचन, लाल श्याम राधा तन गौर॥
इत सिर सोहत पाट की डोरी, हरि सिर रुचिर चन्द्रिका मोर।
यह रसिकनी वे रसिक शिरोमणि, यह ग्वालिन वे माखन चोर॥
यह करनी वे गजवर नायक, यह मालिनी वे भोगी भोंर।
परमानन्द नन्द नन्दन की, राधासी प्यारी नहीं और॥
- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (794)
(राग सारंगा) साँची प्रीति भाई एक जगह। मृगनयनी कमल दल लोचन, लाल श्याम राधा तन गौर.. इत सर सोहत पाट की डोरी, हरि सर रुचिर चंद्रिका मोरे। या रसिकनी, वह गुलाबी मुकुट मणि, या ग्वाले, वह माखन चोर.. या कर्णी, वह गजावर नायक, या मालिनी, वह कामुक भोर। परमानन्द नन्द नन्दन की, राधासी नहीं प्रियतमा और.. - श्री परमानन्द दास, परमानन्द सागर (794)