चलि राधा! तोकौं स्याम बुलावै

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 26 of 33

(राग बसंत) सहज प्रीति गोपालै भावे। मुख देखें सुख होय सखीरी, प्रीतम नैन सों नैन मिलावे॥[1] सहज प्रीति कमल और भानें, सहज प्रीति कुमोदनी और चंदे। सहज प्रीति कोकिला बसंते, सहज प्रीति राधा नंदनंदे॥ [2] सहज प्रीति चात्रक और स्वांते, सहज प्रीति धरनी जल धारे। मन क्रम बचन ‘दास परमानंद', सहज प्रीति कृष्ण अवतारे॥ [3] - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (605) (राग बसंत) सहज प्रीति गोपालाय भावे। दोस्त का चेहरा देखकर खुशी होती है, प्रिय की आंखें बेटे की आंखों से मिलती हैं..[1] सहज प्रीति कमल और लाभ, सहज प्रीति कुमोदनी और दान। सहज प्रीति कोकिला बसंते, सहज प्रीति राधा नंदानंदे..[2] सहज प्रीति छत्रक एवं स्वंते, सहज प्रीति धरणी जल धरे। मन के शब्द हैं 'दास परमानन्द', सहज प्रीति कृष्ण अवतारे। [3] - श्री परमानन्द दास जी, परमानन्द सागर (605)
बाँह डुलावति आवति राधाबाँह डुलावति आवति राधा