वृंदावन क्यों न भये हम मोर
Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास
Verse 31 of 33
(राग मलार)
वृंदावन क्यों न भये हम मोर।
करत निवास गोवर्धन ऊपर, निरखत नंदकिशोर॥ [1]
क्यों न भये बंसी कुल सजनी, अधर पीबत घनघोर।
क्यों न भये गुंजा बनवेली, रहत स्याम जु की ओर॥ [2]
क्यों न भये मकराकृत कुंडल, स्याम श्रवन झकझोर।
परमानंद दास को ठाकुर, गोपिन के चित्तचोर॥ [3]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1375)
(राग मलारा) वृन्दावन हमें मोर से क्यों नहीं डरना चाहिए? ऊपर गोवर्धन बसे, निरखत नन्द किशोर। [1] बंसी राजवंश को क्यों नहीं डरना चाहिए? गुंजा बनवेली क्यों न डरें, श्याम जू की ओर रहें.. [2] मकराकृत कुंडल क्यों न डरें, श्याम श्रवण झकझोर। परमानंद दास को ठाकुरों और गोपियों का विश्वासघाती कहा जाता था.. [3] - श्री परमानंद दास जी, परमानंद सागर (1375)