आज बने सखि नंदकुमार
Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास
Verse 32 of 33
(राग कान्हरौ)
यह माँगों गोपी-जन-बल्लभ।
मानुस-जनम और हरि-सेवा, ब्रज-बसिबौ दीजै मोहि सुल्लभ॥ [1]
श्रीबल्लभ-कुल कौ हौं चेरौ, बैष्णवजन कौ दास कहाऊँ।
श्रीजमुना-जल नित-प्रति न्हाऊँ, मन-बच-कर्म कृष्ण-गुन गाऊँ॥ [2]
श्रीमद्भागवत स्रवन सुनौ नित, इन तजि चित कहुँ अनत न लाऊँ।
'परमानंद' इहि माँगत नित-नित, निरखौं हौं कबहूँ न अघाऊँ॥ [3]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1350)
(राग कान्हरौ) यः मंगोन गोपी-जन-बल्लभ। मनुसा-जनम और हरि-सेवा, ब्रज-बसिबौ दीजै मोहि सुलभ।।[1] श्री बल्लभ- मैं चेरू वंश का कौन हूं, किसे बैष्णवजन का दास कहूं? श्री जमुना-जल नीता-प्रति नहौं, मन-बच्चा-कर्म कृष्ण-गुण गौं।।[2] श्रीमद्भागवत श्रवण सुनौ नित, तजि चित कहुं अनात लौं। 'परमानंद' मेरी दैनिक इच्छा है, यदि कोई भय नहीं है तो मैं स्वतंत्र हूं। [3] - श्री परमानन्द दास जी, परमानन्द सागर (1350)