बाँह डुलावति आवति राधा

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 4 of 33

(राग सारंग) आवत री यमुना भर पानी। सांबरे वरण ढोटा कोंन कोरी माई वाकी चितवन मेरी गेल भुलानी॥ [1] हों सकुची मेरे नयन सकुचे इन नयनन के हाथ विकानी। ‘परमानंद’ प्रभु प्रेम समुद्र में ज्यों जलधर की बूंद समानी॥ [2] - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (राग सारंगा) आवत री यमुना जल भरी। संबारे वरण धोता को कोरी माई वाकी चितवन मेरी गले भुलानि.. [1] नयनन हाथ विकनी होना सकुची मेरा नयन सकुचे। 'आनंद' भगवान के प्रेम के सागर में पानी की एक बूंद की तरह है.. [2] - श्री परमानंद दास, परमानंद सागर
आरती युगल किशोर कीबाँह डुलावति आवति राधा