बाँह डुलावति आवति राधा
Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास
Verse 5 of 33
(राग सारंग)
आवति आनंद कंद दुलारी।
विधु बदनी मृग नयनी राधा दामोदर की प्यारी॥ [1]
जाके रूप कहत नहिं आवैं गुन विचित्र सुकुमारी।
मानो कछू पर्यौ धन आखरि विधना रच्यो संवारी॥ [2]
प्रीति परस्पर ग्रंथि न छूटे ब्रजजन रहे बिचारी।
परमानंददास बलिहारी मानो साँचे ढारी॥ [3]
- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (825)
(राग सारंगा) अवति आनंद केंद्र दुलारी। विधु बदानी मृग नयनी राधा दामोदर की प्रिया। [1] जेके रूप नहीं कहते गुन गन विचित्र सुकुमारी। मनो कछु पर्यौ धन अखारि विधान रच्यो सांवरी।।[2] प्रीति परस्पर ग्रंथियाँ न छूटें, ब्रजजन दरिद्र रहें। परमानन्द दास बलिहारी साँचे के वाहक प्रतीत होते हैं.. [3] - श्री परमानन्द दास, परमानन्द सागर (825)