बाँह डुलावति आवति राधा

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 6 of 33

(राग सारंग) अलकलड़ी मोहन की जोरी। वे रस पुंज नंद जू की जीवनि यह दुलहिन वृषभानु किसोरी॥ [1] वे कुंचित कच मधुप बिसेखित यह सुवेस ग्रथित सिर डोरी। वे अंबुज मुख यह बिधु बदनी वे कोमल कर उरज कठोरी॥ [2] वे गज मत्त प्रबल ब्रज नायक यह सारंग रिपु कृस कटि थोरी। वे ब्रन्दाबन ससि 'परमानंद' अहनिसि नागरि नैन चकोरी॥ [3] - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (800) (राग सारंगा) क्षरदाई मोहन की जोरी। वे रस पुंज नंद जू की जीवनी यः दुल्हिन वृषभानु किसोरी.. [1] वे कुंचित कच मधुप बिसेखित यः सुवेस ग्रथित सर डोरी। वह अंबुज का मुख, वह बिधु का शरीर, जो तन को कोमल बनाये, उरज कथोरी..[2] वे गज मत्त प्रबल ब्रज नायक यः सारंग रिपु क्रिस कटि थोरी। वे ब्रांडबन ससि 'परमानंद' अहनिसी नागरी नैन चकोरी.. [3] - श्री परमानंद दास, परमानंद सागर (800)
बाँह डुलावति आवति राधाआनंद सिंधु बढ्यौ हरि तन में