आनंद सिंधु बढ्यौ हरि तन में

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 7 of 33

(राग गौरी) आनंद सिंधु बढ्यौ हरि तन में। श्रीराधा मुख पूरण शशि निरखत उमगि चल्यौ ब्रज वृंदावन में॥ [1] इत रोक्यौ यमुना उत गोपिन कछु एक फैल पर्यौ त्रिभुवन में। ना परसौ कर्मठ और ज्ञानी अटक रह्यौ रसिकन के मन में॥ [2] मंद मंद अवगाहत बुद्धि बल भक्त हेत लीला छिन-छिन में। कछु एक लह्यौ नंदसुवन कृपा ते सो देखियत परमानंद जन में॥ [3] - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (551) (राग गौरी) तथा सिंधु बध्यौ हरि तन पुरुष। श्रीराधा मुख पुराण शशि निरखत उमागि चल्यौ ब्रज वृन्दावन पुरुष। [1] इत रोक्यौ यमुना उत गोपीन कछू एक फेल परयौ त्रिभुवन पुरुष। परसों, तब तक तुम कर्मठ और ज्ञानी बने रहना गुरु मनुष्य। [2] मन मंद और अज्ञानी है, भक्त के लिए बुद्धि की शक्ति छीन ली जाती है। कछु एक लह्यौ नन्दसुवन कृपा ते सो देख परमानन्द, नर-मानव-मानव।।[3] - श्री परमानन्द दास जी, परमानन्द सागर (551)
बाँह डुलावति आवति राधाबाँह डुलावति आवति राधा