बाँह डुलावति आवति राधा

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 8 of 33

(राग सारंग) बाँह डुलाबति आवति राधा। बदन कमल झँपति न उघारति रह्यौ है तिलक मिटि आधा॥ [1] गिरिधर लाल कुंवर नंदनंदनतैं जु प्रेम करि लाधा। रहसि मिली प्राण प्यारे कौं रही न एकौ साधा॥ [2] कारज अधर मिल्यौ नैननि कौं मिटी काम की बाधा। ‘परमानंद' स्वामी रति नागर तेरौ पुन्य अगाधा॥ [3] - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (826) (राग सारंगा) बन्ह दुलबती अवति राधा। शरीर कमल झनपति न उग्रति रहयौ है तिलक मिटी अधा।।[1] गिरिधर लाल कुँवर नन्दनन्दनतिं जु प्रेम करि लाधा। रहसी मिलि प्राण प्यारे कौन रही न एको सदा.. [2] कारज अधर मिल्यौ नानानि कौन मिटी काम हिंदी है। 'परमानंद' स्वामी रति नगर तेरौ पुण्य अगधा.. [3] - श्री परमानंद दास जी, परमानंद सागर (826)
आनंद सिंधु बढ्यौ हरि तन मेंबाँह डुलावति आवति राधा