बाँह डुलावति आवति राधा

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 9 of 33

(राग सारंग) बाँह डुलावति आवति राधा। बदन-कमल झंपति न उघारति, रह्यौ है तिलक मिटि आधा॥ [1] गिरिधरलाल कुँवर नंदनंदन, तैं जु प्रेम करि लाधा। रहसि मिली प्रान-प्यारे कौं, रही न एकौ साधा॥ [2] काजर अधर मिल्यौ नैननि कौ, मिटी काम की बाधा। 'परमानंद' स्वामी रति-नागर, तेरौ पुन्य अगाधा॥ [3] - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (826) (राग सारंगा) बन्ह दुलवती अवति राधा। कमल तन उग्र नहीं, तिलक आधा धूलि। [1] गिरिधरलाल कुँवर नन्दनन्दन, तुम मुझे प्रिय हो। मेरे प्रिय आत्मन्, वहाँ कौन है? संत केवल एक ही है..[2] काजर अधर मिल्यौ नैननि कौ, मिटी काम हिंदी है। 'परमानंद' स्वामी रति-नगर, तेरौ पुण्य अगाधा.. [3] - श्री परमानंद दास जी, परमानंद सागर (826)
बाँह डुलावति आवति राधाबाँह डुलावति आवति राधा