रूप हद नेह हद मधुर अनूप हद

Prem Das Vani — श्री लाल बलबीर

Verse 7 of 11

(कवित्त) रूप हद नेह हद मधुर अनूप हद, सीतल सुघर हद मन के हरण हैं। [1] विमल पराग हद अरुण अमित हद, पानप सरस हद दुति के धरण हैं॥ [2] नख जिमि इन्दु हद अंबुज वरण हद, प्रेम कौ समूह हद लाल वसीकरण हैं। [3] प्रेम सखी सुधा हद उपमा लजात हद, सुख के कारण हद राधे के चरण हैं॥ [4] - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (24) (कविता) रूप प्यारा था, प्रेम मधुर था, शीतलता मधुर थी, मन खो गया। [1] विमल पराग के पास अरुण अमित, पानप सारस के पास दत्ती धरन.. [2] नख जिमी इंदु के पास अंबुज वरण, प्रेम कौ समूह के पास लाल वशीकरण है। [3] प्रेम सखी सुधा की उपमा अद्भुत थी, सुख का कारण राधे के चरण थे.. [4] - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भाई), श्री प्रेम दास जी के शब्द (24)
एहो सुकुमारी प्रान प्यारी हौ बिहारी जू कीएहो सुकुमारी प्रान प्यारी हौ बिहारी जू की