लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि

Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 120 of 124

अन्योन्यहास परिहास विलास केली वृन्दावने वैचित्र्य जृम्भित महारस-वैभवेन। वृन्दावने विलसितापहृतं विदग्ध द्वन्द्वेन केनचिदहो हृदयं मदीयम्॥ - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (49) पारस्परिक भोग-विलास के निमित्त वृन्दावनवैचित्र्य जृम्भित महारास-वैभवेन। वृन्दावन विलासितपहृतं विदघ द्वन्देन केन्चिधाहो हृदयं माद्यम। - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (49)
लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहिलोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि