लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि

Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 80 of 124

सुधाकरमुधाकरं प्रतिपदस्फुरन्माधुरी, धुरीण नव चन्द्रिका जलधि तुन्दिलं राधिके। अतृप्त हरि-लोचन-द्वय चकोर-पेयं कदा, रसाम्बुधि समुन्नतं वदन-चन्द्रमीक्षे तव॥ - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (161) सुधाकरमूढ़ाकर्ण प्रतिपदास्फुरणमाधुरी, धुरिं नव चंद्रिका जलधि तुण्डिलं राधिके। संतुष्ट हरि-लोचन-द्वय चकोरा-पेन कड़ा, रसबुद्धि समुन्नतं वदना-चंद्रमक्षे तव.. - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (161)
लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहिलोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि