रसिकवर रसिकनी रस रासि
Ras Ke Pada —
Verse 10 of 28
प्रियालाल देखि मन फूले।
देखि देखि लालन सुख पावै, रूप रंग रस झूले॥ [1]
प्रिया लाल के तन लपटानी, प्रिय की कृपा अतूले।
चतुरसखी या छवि कूँ निरखत, तन मन को सुधि भूले॥ [2]
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (3)
मैं प्रियालाल को देख कर खुश हो गया. देखो ललन को सुख मिलता है, उसके नैन-नक्श झूलते हैं। [1] प्रिया लाल का शरीर चपटा था, उसके प्रियतम की दया अपरम्पार थी। चतुरासखी या छवि क्यों अलिखित है, भूलो तन मन का बोध। [2] - श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी के वचन, रस के छंद (3)