रसिकवर रसिकनी रस रासि

Ras Ke Pada —

Verse 12 of 28

रंग हिडोरना री झूलत लाडिली पिय के संग। मंद मंद झूलत फूलति है, पहिरें बसन सुरंग॥ [1] अंग अंग सुख बरषत हरषत, छवि को उठत तरंग। सुख में झूलत कुंवर किसोरी, भरि भरि लेत उछंग॥ [2] श्री ललितमोहनी प्यारी पिय की निरखत केलि अभंग॥ [3] - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (66) रंग हिदोराना का झूला प्रिय पिया संग। मन धीरे-धीरे झूम रहा है, सुरंग कपड़े से ढंकी हुई है... [1] आनंद, वर्षा और अंग-अंग का आनंद, छवि तक उठती लहरें। ख़ुशी में नाच रहे हैं, खूब उछल रहे हैं कुँवर किसोरी.. [2] श्री ललितमोहिनी प्यारी पिया के निरखत केलि अभंग.. [3] - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस पद (66)
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