रसिकवर रसिकनी रस रासि

Ras Ke Pada —

Verse 14 of 28

रूप के जाल परयौ मन मेरौ। जोवन रस पीवत न अघातौ, मुसिकनि हूँ अरुझेरौ॥ [1] कुंजमहल रतिपति दल छायौ, विवस भयौ बिबि नेरौ। श्रीललितमोहिनी सब सुख दीनौं, दुहुँनि नेह घनेरौ॥ [2] - श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी, शृंगार रस के पद (44) मेरा मन जल रूपी स्वरूप में स्थित है। जोवन रस पिवत न अघाटौ, मुसिकनि हुण अरुझेरौ।।[1] कुंजमहल रतिपति दल छयौ, विवस भयौ बीबी नेरौ। श्री ललित मोहिनी सब सुख दिनौ, दुहुंनि नेह घनेरौ.. [2] - श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस पद (44)
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