बैठी है झरोखे प्यारी कुंज

Ras Ke Pada —

Verse 18 of 28

(राग केदार) बैठी है झरोखे प्यारी कुंज भवन मों महलु न पावे पीय ठाढे दरसन कों। [1] उजारी तें उजारी माथे माँग सोहे गंगा जैसे जानी हरि भए अतिहेतु परसन कों॥ [2] जानी है बाति गुर भई ललिता जीउ ल्याई हैं लालु तहाँ निधि बरसन कों। [3] मिल्ये है मोहन राधा केवल छवि अगाधा मेट्यो है दोऊ उर काम तरसन कों॥ [4] - श्री केवल राम जी, रास मान के पद (100) (राग केदारा) झरोखे : झरोखे में बैठे प्रिय कुंज भवन, मत पियो प्रिये। [1] उजारी ते उजारी माथे मांग सोहे गंगा जैसी जानी हरि भये अतिहेतु परसन को.. [2] जानी है बटी गुड़ भाई ललिता जिउ लाए तहां निधि लालू के अलावा कौन? [3] मोहन राधा मिले केवल छवि अगाध मेट्यो है दोउ उर काम तरसन कोण.. [4] - श्री केवल राम जी, रस मन के पद (100)
आजु प्यारी के संगि रसिक राइ गुपालकहा कहों कछु कहनु न आवे