कहा कहों कछु कहनु न आवे

Ras Ke Pada —

Verse 19 of 28

(राग कान्हरौ) कहा कहों कछु कहनु न आवे। तेरी सों वृषभान नंदिनी तव मुख सम छबि चंदु न पावे॥[1] छिन छिन मों दुरि जात घटा महि निकसत पैसत हेरि लजावे। त्रिभुवन महि तो सी है तूही केवल रतिपति कहा कहावे॥ [2] - श्री केवल राम जी, रास मान के पद (82) (राग कान्हरौ) क्या कहूँ, क्यों कहूँ कुछ? आपके पुत्र वृषभान नंदिनी को चंदू का चेहरा और छवि न मिले..[1] छिन छिन मोन दुरि जात घाटा मही निकासत पइसत हेरी लाजावे। त्रिभुवन माही तो है तुहि केवल रतिपति कहवे.. [2] - श्री केवल राम जी, रस मन के पद (82)
बैठी है झरोखे प्यारी कुंजमानुनी मानु कीओ किह काज