प्यारी मेरो लालु रंगीलो रंगीली

Ras Ke Pada —

Verse 24 of 28

(राग केदारौ) प्यारी मेरो लालु रंगीलो रंगीली के बसि पर्यो। अतिगंभीर सोभा गुन सागर पाछें डोलत रस भर्यो। [1] निरखि निरखि चटकी सी लागी नैन नेह ढरनी ढर्यो। ‘केवल’ नित बिहारी बिहारिनि बाल सनेहु रिदहि धर्यो।[2] - श्री केवल राम जी, रास मान के पद (110) (राग केदारौ) मेरे प्यारे लालू रंगीलो रंगीली के बसि परयो। अतिग्नभिर सोभा गुन सागर पछेहें डोलत रस भरयो। [1] आँखें ज़मीन पर टिके बिना चमकती हुई लग रही थीं। 'केवला' नीता बिहारी बिहारिणी बाल सनेहु रिद्धि धरयो। [2] - श्री केवल राम जी, रस मन के पद (110) हे मित्र, मेरा रंगीन पुत्र [कृष्ण] सदैव रंगीन ठकुरानी श्री राधा के वश में रहता है। श्री राधा ठकुरानी अपार सौंदर्य और गुणों का सागर हैं, मेरा पुत्र परमानंद की स्थिति में उनका अनुसरण करता है। [1] मैं उन्हें देखे बिना ही बलिहारी जा रहा हूं, मेरी आंखों से प्रेम के आंसू बह रहे हैं। श्री केवल राम जी कहते हैं कि मेरा हृदय सदैव श्री बिहारी बिहारिणी [राधा कृष्ण] के प्रेम में डूबा रहता है। [2]
बैठी है झरोखे प्यारी कुंजप्यारी तेरो मानु मनावन आँई