रसिकवर रसिकनी रस रासि

Ras Ke Pada —

Verse 6 of 28

जैसे मेरे जिय में तू बसत है, ऐसे हों तेरे जिय में बसत हौं कैधौं नाहीं। तेरी छवि मेरी अंखिया भरि रही, कछु न सुहाइ मेरौ जीवन तौ ताहीं॥ [1] सुनि मेरे प्रानपति प्यारे, तू ही मम जीवन तू ही प्रान-तन माहीं। श्रीललितमोहनी कौ सुख बिहरौ, अब जिन करौ बिलंब कहत समुझाहीं॥ [2] - श्री ललित मोहिनी देव, ललित मोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (59) जैसे तुम मेरे दिल में रहते हो, मुझे भी तुम्हारे दिल में रहने दो, कैदी नहीं। तेरी छवि मेरे कंधों पर भारी रही, मेरे जीवन में कुछ भी सुखद नहीं रहा.. [1] सुनो मेरे प्यारे पति, तुम मेरी माँ की आत्मा हो, तुम मेरी आत्मा और शरीर हो। ललित मोहिनी जी, अब समझ आया कि बिलानब क्या कह रहे हैं। [2] - श्री ललित मोहिनी देव, ललित मोहिनी देव जू की वाणी, रस की वाणी (59)
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