महल ते निकसी न बाहर आवैं

Rasik Dev Vani — श्री रसिक देव

Verse 4 of 9

मंद हँसनि मुख कमल की, मुरि चितवनि इहि ओर। बसि करयौ तिहि भाँमिनी, लै गई प्राँन अकोर॥ - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (7) मन हँस रहा है, मुख कमल-सा है, चेतावनी इसी ओर है। बसि करयौ तिहि भनमिनि, लै गै प्राण अकोर.. - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस के मित्र (7)
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