श्रीबिहारीजू खेलत बसंत

Rasik Dev Vani — श्री रसिक देव

Verse 6 of 9

(राग वसन्त) श्रीबिहारीजू खेलत बसंत। रंग भरी सब सखी विराजत राधे जू रूप लसंत॥ [1] फूले जोवन मौर मंजरी अधर पान उलहंत। आयौ मदन मनों सैन साजि कैं चँवर चिकुर ढरंत॥ [2] छूटत मूक झूक सौरभ की नैंन गुलाल उडंत। कूजत मधुकर मंजीर कोकिला बाजे बजत अनंत॥ [3] मच्यौ परस्पर खेल कटाक्षिन क्रीडत भामिनि कंत। श्रीरसिकबिहारी को सुख निरखत धीरज कौन धरंत॥ [4] - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (20) (राग वसंत) श्रीबिहारिजू खेलत बसंत। सब सखियाँ रंग भरी हैं, राधे वासना रूपी हैं.. [1] फुले जोवन और मंजरी रंग भरी हैं, आनंद भरी हैं। आयु मदन मनोन सज्जि कैं चंवर चिकुर धरंत.. [2] सौरभ का मुख झुका, उड़ता गुलाल। कुजात मधुकर मंजिर कोकिला बाजे बाजत अन्नत.. [3] मचायौ पारस्परिक खेल व्यंग्य क्रीदत भामिनी कांत। प्रसन्नता और धैर्य के बिना श्री रसिकबिहारी का समर्थन कौन कर सकता है? [4] - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी के वचन, सिद्धांतों के सिद्धांत (20)
महल ते निकसी न बाहर आवैंमहल ते निकसी न बाहर आवैं