महल ते निकसी न बाहर आवैं
Rasik Dev Vani — श्री रसिक देव
Verse 7 of 9
स्याम हौं तुम्हरे गरैं परयौ,
जो बीती तुम्ही सौं बीती मन मानैं सु करौ।
रसिक दास की आस करुणानिधि, तुम्हीं ढरो सो ढरो॥
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (02)
मैं आपका प्रिय मित्र हूं, आपकी जितनी इच्छा हो उतनी सुनता हूं। रसिक दास के अस करुणानिधि, पकड़ो तो पकड़ो.. - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी के वचन, सिद्धांत के दोहे (02)