वृंदावन तजि तीरथ जांही

Rasik Dev Vani — श्री रसिक देव

Verse 8 of 9

वृंदावन तजि तीरथ जांही, ते अज्ञान कछु समझत नाहिं। - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जू की वाणी मैं वृन्दावन की तीर्थयात्रा के विषय में कुछ नहीं जानता, परन्तु अज्ञान कुछ भी नहीं समझता। - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी के वचन, जो व्यक्ति वृन्दावन छोड़कर कहीं और रहता है, उससे बड़ा कोई अज्ञान नहीं हो सकता।
महल ते निकसी न बाहर आवैंवृन्दावन बसि कष्ट जो होइ, कोटि मुक्ति सुख भुगतै सोइ