फिरति रहे वन भूमि में, झूमि नैन अकुलाय।
Rasik Mohini — श्री प्रियादास
Verse 15 of 27
फिरति रहे वन भूमि में, झूमि नैन अकुलाय।
घूम घूम तन लोट के, उठे रूप गुन गाय॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (21)
वे जंगल में घूमते रहते हैं, उनकी आँखें चुपचाप घूमती रहती हैं। शरीर गिरा, सौंदर्य उमड़ा.. - श्री प्रियादास जी, रोमांटिक मोहिनी (21)